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The Purushartha Series – Understanding Kama

The Purushartha Series – Understanding Kama

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*The Course will be offered in the self-paced model if the number of registrations is less than 15.

Duration
30 Hours
Date & Time

Coming Soon - Every Saturday

10 AM -11 AM IST

Price

Course Fee: ₹5500
Early Bird Offer: ₹5000
Early Bird offer valid till 12th February 2022
Medium of Instruction
Hindi and English
Delivery
Online through Indica Courses Learning Portal
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वैदिक संस्कृत साहित्य में काम शब्द ब्रह्म (सर्वोच्च शक्ति या ऊर्जा) का परिचायक था । कालान्तर में काम शब्द पुरुषार्थ के रूप में प्रयुक्त होने लगा । वैदिक और उपनिषदिक काल के बहुत बाद काम शब्द षड़रिपु में भी उल्लिखित होने लगा । संसार के सभी प्राणी काम के द्वारा ही किसी भी कार्य में प्रवृत्त होते हैं । भारतीय चिन्तन परम्परा में काम शब्द का अर्थ ब्रह्म (शिव), काम पुरुषार्थ और काम षड़रिपु तीनों के लिये प्रयोग होता रहा है । काम एक भाव है इसीलिये भावों के आधार पर काम का अर्थ निर्धारण किया जाता है । 

काम शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ इच्छा लिया जाता है । सृष्टि–उत्पत्ति का मूलाधार काम ही है । काम शब्द का सामान्य अर्थ – “कामयते इति काम:” है, अर्थात् विषय और इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाला मानसिक आनंद ही वास्तविक काम कहलाता है । काम के दो भाव होते है – रति और प्रीति (कामस्य द्वे भावे रतिश्च प्रीतिश्च) । मानवीय सामाजिक जीवन में काम शब्द के अनेक अर्थ लगाये जाते हैं, जैसे कि – कामना, इच्छा, भावना, आनन्द और रतिसुख आदि ।

ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख है कि काम (इच्छा) के द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति हुई । काम के माध्यम से ही संसार के सभी जीवों की प्रवृत्ति (विशेषरूप से मानवों की) पूर्णता की ओर अग्रसर होती है, क्योंकि मनुष्य सभी प्रकार की इच्छाओं से परिपूर्ण होता है । मानव काम के माध्यम से अपने उच्चतम स्तर को प्राप्त करता है । मनुष्य अपनी तात्त्विक शक्ति के द्वारा अपनी चेतना का भी चिन्तन करता है । काम एक मानसिक व्यापार भी है । काम के व्युत्पत्ति के विषय में कहा जाता है कि – ‘काम्यते इति कामः’ अर्थात् विषय और पंचज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त मानसिक सुख ही प्रमुखरूप से काम है । ‘काम्यन्ते इति कामाः’ अर्थात् विषय और इन्द्रियों के सानिध्य से लभ्यर्थ काम, जो साधन का कार्य भी करता है, उसे भी काम कहते हैं । ‘कामितं कामः’ अर्थात् जिसके माध्यम से मानव सुख की कामना करता हुआ, मानसिक संकल्प के स्तर पर प्रेरित होता है, वह काम कहलाता है । मन के संकल्प और विकल्प के द्वारा ही आन्तरिक काम का उद्भव होता है । काम सम्पूर्ण सृष्टि का बीज स्वरूप है, क्योंकि बिना इच्छा के संसार के किसी भी तत्त्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । काम के सन्दर्भ में राष्ट्रिय पंडित श्री व्रजवल्लभ द्विवेदी लिखते हैं – “वेदों का अध्ययन और वैदिक कर्मकाण्ड का अनुष्ठान भी एक प्रकार की कामना ही है । काम की उत्पत्ति संकल्प से होती है । यज्ञ की उत्पत्ति भी संकल्पमूलक ही है । व्रत और यम–नियम भी संकल्प से ही उत्पन्न हुये हैं । इस संसार में बिना कामना के कोई मनुष्य किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता । मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब काम (इच्छा) का ही खेल है । इनमें से शास्त्रोक्त कर्मों का यथाविधि आचरण करने वाला मनुष्य अमरलोक को प्राप्त करता है और इस लोक में सभी संकल्पित कामनाओं को प्राप्त करता है।”

सामान्यरूपेण काम शब्द को लेकर समाज में जो सर्वव्यापी भावना व्याप्त है, वह है काम अर्थात् Sexual pleasure । काम का यह एकांगी अर्थ तो एक सीमा तक वर्तमान समय में संभावित है लेकिन काम इससे परे भी कई अर्थों का द्योतक है । काम शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है – ‘काम्यते इति कामः’ अर्थात् इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होनेवाला मानसिक आनन्द, यदि इस अर्थ को ही गृहीत किया जाए तो कई स्थानों पर अर्थ की संगति लगाना दुष्कर कार्य प्रतीत होता है । उदाहरणार्थ श्रुति का स्पष्ट कथन है कि काम मन का, चित्त का बीज है, जो परमात्मा के हृदय में पहले से ही विद्यमान है । चूंकि परमात्मा की सत्ता तो इन्द्रियातीत है फिर काम का अर्थ इन्द्रियों के सम्पर्क से उत्पन्न होनेवाला मानसिक आनन्द कैसे संभव है ?

काम – मानस प्रक्रिया, मानसिक व्यापार अथवा रागात्मिका वृत्ति का नाम काम है| यह रागात्मिका वृत्ति प्रत्येक प्राणी के भीतर प्रकृत रूप में विद्यमान रहती है| मनुष्य के भीतर जैसे श्रद्धा, मेधा, क्षुधा, भय, निद्रा, स्मृति आदि अनेक वृत्तियाँ रहती है, ठीक उसी प्रकार काम वृत्ति का भी आधान है| राग के रूप में स्थित यह कामवृत्ति मनुष्य की इच्छाओं को जागृत करती है, उसको भौतिक संकल्प–विकल्पों की ओर प्रेरित करती है| उसी का एकरूप आनंद विधायिनी कला के रूप में भी संपूजित है| वैदिक मान्यताओं के अनुसार कामभाव से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई| ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ के अनुसार प्रारम्भ में एकाकी प्रजापति ने सृष्टिरचना की कामना से प्रेरित होकर स्वयं को दो रूपों में विभाजित किया| उसका एक भाग नर और दुसरा नारी है –   

द्विधा क्रित्वात्मनो देहमर्धेन पुरुषोsभवत्| अर्धेन नारी  तस्यां  स विराजमसृजत्प्रभु:||

नर के द्वारा नारी में गर्भ धारण प्रक्रिया को विराज कहते है| उस विराज से विराट की सृष्टि हुई| यह जन्मधारण  करने वाली संपूर्ण प्रजा विराट का ही रुपान्तरण| प्रजापति के द्विधा विभक्त होने की परिणति अर्धनारीश्वर रूप है| वैदिक अग्नि-सोम उसी के रुपान्तरण है| नारी(माता) का अंश सोमतत्त्व है और नर(पिता) का अग्नितत्त्व है| प्रकृति-पुरुष, सोम–अग्नि, द्यावा–पृथिवी, योष–वृषा और माता–पिता आदि सबके एकत्व भाव का अधिष्ठान ‘अर्धनारीश्वर’ रूप है| अत: इस प्रकार प्रत्येक नर में नारी और प्रत्येक नारी में नर की सत्ता है| इसी बात को ऋग्वेद में कहा गया है कि, जिन्हें नर कहते है वे नारी है और जो नारी है वस्तुत: नर है| जिसके पास वास्तविक नेत्र है, वही इस रहस्य को देख पाता है –  

स्त्रीय: सतीस्ताम् उमे पुंस आहु: पश्यदक्षन्वान्न  विचेतदग्ध:| 

सांख्य दर्शन में इस रागात्मिका द्वंद्व भाव को ‘गुणक्षोभ’ कहा जाता| इसमें बताया जाता है कि सृष्टि से पूर्व सत्त्व, रज और तम तीनों गुण बराबर मात्रा में रहते है| जब प्रकृति और पुरुष का आपसी मिलन होता है तब इन तीनों गुणों में आपस में विकार उत्पन्न होता है| सर्वप्रथम क्रियाशील रजोगुण में स्पंदन होता है और उसके बाद सत्त्व तथा तम प्रेरित होते है| उसके बाद प्रकृति में भीषण गतिशीलता उत्पन्न होती है| ऐसी स्थिति में ये तीनों गुण एक-दुसरे को समाहित करना चाहते है| तब गुणों में कम और अधिक की स्थिति उत्पन्न होती है और गुणों के कम और अधिक के अनुपात से अनेकानेक सांसारिक विषयों का उद्भव होता है| बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रिय और तन्मात्राओं से अधिष्ठित, इस पञ्चभौतिक संसार के विकास में नर–नारी का मिलन होता है| प्रत्येक नर-नारी में इस मिलन की प्रवृत्ति रागात्मिका वृत्ति के कारण होती है, जो कि प्रत्येक नर-नारी में प्राकृतिक रूप से रहता है| काम मनसिज या संकल्पयोनि है| मन का अधिष्ठान मन्यु है| मन्यु भाव के लिए जायाभाव आवश्यक है| मन्युभाव और जायाभाव ही प्रकृति–पुरुष है| मन्यु भाव में स्थित मन ही काम संकल्प की सृष्टि करता है| काम की यह सृष्टि अमृतमयी अथवा आनंदमयी कहीं जाती है| काम तत्त्व पर चिंतन करते हुए वैदिक ऋषि कहता है कि– सृष्टि के उत्पत्ति के समय सर्वप्रथम ‘काम’ अर्थात सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा उत्पन्न हुयी, जो परब्रह्म के ह्रदय में सर्वप्रथम सृष्टि का रेतस् अर्थात बीजरूप कारणविशेष था| जिसे ऋषियों ने परब्रह्म के गंभीर चिंतन से प्राप्त किया था| अत: ऋग्वेद के इस कथन से स्पष्ट है कि सृष्टि के मूल कारण ‘काम’ की उत्पत्ति परब्रह्म के ह्रदय से हुई-

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेत: प्रथम: यदासीत| सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा:|| 

परमेश्वर को यह इच्छा हुई की मैं अपना विस्तार करूं और वह अनेक हो गया– तदैक्षत बहुस्याम्| शिव (पुरुषाग्नि) और शक्ति(योषाग्नि) के संयोग से सृष्टि की उत्पत्ति हुई- शिवशक्ति संयोगात् जायते सृष्टिकल्पना| पुरुष (ब्रह्म, नर+नारी) काममय है, उसका स्वरूप, उसकी शक्ति और प्रकृति सब कुछ काममय है-

स: कामयत  बहुस्यां प्रजायेत| काममय एवायं पुरुष:||

इसी कामवृत्ति के कारण हिरण्यगर्भ से सर्वप्रथम बीज (विराट्) की उत्पत्ति हुई, अर्थात् जैसे एक विशाल वट वृक्ष एक छोटे से बीज में बंद रहता है| उसी प्रकार यह विराट् विश्व हिरण्यगर्भ में समाहित था| ऋग्वेद की एक ऋचा में कहा गया है कि, प्रारम्भ में केवल हिरण्यगर्भ था| जन्म लेने पर वह सभी भूतों का एकमात्र स्वामी बना-

हिरण्यगर्भ समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्| सदाधार पृथिवीं द्यामुपेतामि||

जब ऋग्वेद में प्रश्न यह उठता है कि कौन जानता है, कौन कह सकता है कि यह सृष्टि कहां से आयी, किसने इसको उत्पन्न किया? देवगण भी काम की उत्त्पत्ति के बाद हुए| फिर कौन जानता है कि यह सृष्टि कहा से आयी-

को अद्धा वेद क इह प्रवोचत, कुत अजाता  कुत  इयं विसृष्टि:|

अर्वाग्देवा   अस्य   विसर्जनेनाथा,  को   वेद  यत    आबभूव||

इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमें श्रुतियों में ही मिलता है| विज्ञान रूप अव्यक्त जगत के सृजन और जीवों को उनके अदृष्ट के फलोपयोग के लिए, उस विराट पुरुष हिरण्यगर्भ को सृष्टि के लिए कामना हुई| उस आदि पुरुष से जब एकाकी न रहा गया, तब उसने अपने साथ के लिए दुसरे की इच्छा की-

स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते द्वितीयमैच्छत्, स हैतावानास यथा स्त्री पुमाsसौ समपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वैधापातयत्तत पतिश्च पत्नीं चाभवताम्| 

इसी इच्छा पूर्ति के लिए अजन्मा होकर भी वह गर्भ में जाता है और बहुधा जन्म धारण करता है-

प्रजापतिश्चरति गर्भ अंतर जायमानो बहुधा विजायते| 

‘मुंडकोपनिषद्’ में कहा गया है कि- जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से सहस्त्रों स्फुलिंग उठते है, उसी प्रकार उस अनश्वर, अविनाशी पुरुष से विभिन्न वस्तुएं उत्पन्न होती है और प्रलयकाल में उसी में समा जाती हैं- 

यथा सुदीप्तात्पावकात् स्फुलिंगा: सहस्त्रशः प्रभवन्ते सरूपाः|

तथाक्षराद्विविधा: सौम्य भावा: प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति||

भारतीय दर्शनों में पुरुष-प्रकृति अथवा ब्रह्म-माया के सम्बन्ध से जगत का उद्भव बताया जाता है| सत् पुरुष के साथ असत् प्रकृति उसी प्रकार से संयोंजित है, जैसे की एक पृष्ठ के साथ दूसरा पृष्ठ, बर्तन के बाहरी भाग की भांति भीतरी भाग अथवा शरीर के साथ छाया| ‘यजुर्वेद’ में पुरुष को प्रयति और प्रकृति को स्वधा कहा जाता है| प्रयति ने आधान के लिए प्रयत्न किया और स्वधा ने उसका धारण किया क्योंकि स्वधा नीचे थी और प्रयति ऊपर-

‘स्वधा अवस्तात् प्रयति: परस्तात्’|

पुरुष अविकारी है और प्रकृति प्रधान विकारी है| जिस प्रकार स्फटिक पर रंगीन प्रकाश की आभा पड़ती है, वैसे ही पुरुष पर प्रकृति के विकारों का कृत्रिम प्रभाव पड़ता है और तब यह मायामयी सृष्टि सुख, दु:ख, कर्ता, धर्ता, भोक्ता आदि भावों का अनुभव करती है| माया परमेश्वर की बीजशक्ति है| माया ही अनेक नाम रूपों का कारण है| माया और परमेश्वर वस्तुत: एक ही है क्योंकि जिस प्रकार आग की अगिन्त्व आग से अलग नही है| माया के माध्यम से ही परमेश्वर को इच्छा होती है अर्थात माया ही परमेश्वर की कामभावना, मानसिक क्रिया है|  श्री कृष्ण ने ‘गीता’ में कहा है कि- ‘हे अर्जुन, नाना प्रकार की योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीर उत्पन्न होते है, उन सबकी त्रिगुणमयी माया तो गर्भ को धारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ’- 

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: संभवन्ति या:| तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता||

आगे भी, श्री कृष्ण कहते है कि, मैं जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मेरे द्वारा ही उसका प्रवर्तन होता है- 

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते| (गीता)

अत: एकत्व से द्वित्व और अनेकत्व की भावना के मूल में काम ही एकमात्र कारण है| परमेश्वर के ह्रदय में प्रारम्भ से ही वह बीज(रेतस्) रूप में विद्यमान था और उसी की प्रेरणा, उद्बोधना, चेष्टा से परमेश्वर में सृष्टि रचना के लिए कामना, इच्छा उत्पन्न हुई| उस काममय परम पुरुष, पुरुषोत्तम, बीजप्रद पिता द्वारा अनंत काल से इस जीव जगत का संचालन होता गया| उसकी विराट सत्ता का, अनंत विभूतियों का, विश्वरूप दर्शन का वर्णन श्रुतियों, उपनिषदों और दर्शनों में देखने को मिलता है| ‘गीता’ में श्री कृष्णा कहते है कि, हे अर्जुन, मैं सब प्राणियों में धर्मानुकुल कामस्वरूप हूँ- धर्माबिरुधो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ:| 

काम के विषय में शिव पुराण में उल्लेख आता है कि- काम संकल्प है- कामो संकल्प एव हि|

त्रिवर्ग की चर्चा छान्दोग्योपनिषद में आती है जिसमें धर्म, अर्थ और काम को प्रधान बताया जाता है-

प्रजापतीर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योsभितप्तेभ्यस्त्रयी

विद्या संप्रास्त्रवास्ताम-भ्यतपत्| 

प्रथम अध्याय – पुरुषार्थ : दार्शनिक एवं सांस्कृतिक निरुपण

  • पुरुष और पुरुषार्थ
  • पुरुषार्थ अवधारणात्मक व्याप्ति
  • पुरुषार्थ, संस्कृति और सभ्यता
  • पुरुषार्थ सिद्धि के साधन
  • पुरुषार्थ त्रिवर्ग, चतुर्वर्ग और पंचमवर्ग की अवधारणा
  • पुरुषार्थ चतुष्टय और राजनीति विद्या का अन्तःसम्बन्ध
  • पुरुषार्थ यज्ञ स्वरूप

द्वितीय अध्याय – काम पुरुषार्थ के दार्शनिक आयाम

  • काम का विकास क्रम
  • काम शब्द की व्युत्पत्ति
  • काम के त्रिस्तरीय सिद्धान्त
    • काम : ब्रह्मस्वरूप
    • काम : पुरुषार्थस्वरूप
    • काम : रिपुस्वरूप

तृतीय अध्याय – काम पुरुषार्थ के सांस्कृतिक आयाम

  • कला का उद्भव और विकास
  • कामसूत्रानुसार चतुःषष्टि कला
    • चतुःषष्टि का अर्थ और चतुःषष्टि कलाएं
    • पांचालिकी चतुःषष्टि कला
  • काव्य और कला
  • विद्या और कला

 

*Please note that if the number of registrations is less than 15, this Indica Course will be offered in the self-paced mode. The change of format shall be notified through email. Learners will also be notified when pre-recorded lectures are available for their perusal on the learning portal. There will no change in the course fee. Learners not interested in pursuing the self-paced format can either request for a transfer into any existing or upcoming course or a credit voucher redeemable in future for another course.

Teacher
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Dr. Raghavendra Mishra

Assistant Professor, Miranda House, Delhi University

Dr. Raghavendra Mishra is a scholar of Sanskrit Language, Literature, Cultural and Indic Studies. He was awarded Ph.D. from the School of Sanskrit & Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. He has completed his M.A and M. Phil degrees from the School of Sanskrit & Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.His M. Phil. research was on "Cultural and Philosophical Dimensions of Kama – Purushartha” and his Ph.D. thesis was on "Spiritual, Social and Psychological Study of Kamashastra". Dr. Mishra has taught the SK-210 Course “Pratyabhijna Darshan - Self Realization” in Jawaharlal Nehru University. He has delivered talks on Indian Vedic Traditions in the Bhishma Indic Centre at Pune, Maharashtra. He has qualified the UGC-NET/JRF twice - in Sanskrit and Women Studies. He was much appreciated for his subject presentation on "Tripartite Theory of Kama" in the Indian Knowledge System at the International Conference at Texas, USA. His research and ideas are focused to solve problems related to family and social life. He holds ideas on life-work balance for meaningful life; how to handle social problems like depression, suicide, problems related to unitary family in urban setting, health and wellbeing of youth, including mental health issues, overcoming inferiority complex and sexual problems, issues related to marriage and kinship, annulment and split families, inter-personal relationship etc. Dr. Mishra has been awarded the Sanskrit Pratibha Puraskar twice by the Delhi Sanskrit Academy. He has also won the Delhi Para Athlete Award by the Government of NCT Delhi, New Delhi twice. To his credit, he has composed Chalisa (poetic verse), for our great freedom fighters in Indic verse and contemporary Doha and Chaupai style. He has published three chapters in books and many researched papers in refereed national and International journals, and presented papers and participated in many national and international conferences, seminars, workshops etc.

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