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Kamasutra : As a Universal Text

Kamasutra : As a Universal Text

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Duration
36 Hours
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06:30 PM-7:30 PM IST

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Course Fee: ₹7500
Early Bird Offer: ₹7000
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Medium of Instruction
Hindi and English
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भारतीय बौद्धिक परम्परा में ऋषि/ऋषिकाओं ने मनुष्य के सर्वांगीण विकास हेतु, अनेक शास्त्रों के माध्यम से दार्शनिक चिन्तन एवं मनन का मार्ग प्रशस्त किया है। इसी चिन्तन परम्परा में कामशास्त्र की भी एक अक्षुण्ण परम्परा प्रतिष्ठित रही है। भारतीय ग्रन्थ परम्परा में अध्यात्म, शास्त्र, धर्म, दर्शन, तन्त्र और विज्ञान, ये पारिभाषिक शब्द परस्पर सम्पूरक अर्थसत्ता से सम्बन्धित है।  

कामशास्त्रीय‌ ग्रन्थ लेखन की परम्परा भारत में अत्यन्त प्राचीन है। इस ग्रन्थ परम्परा का निहितार्थ सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के आदि उपदेश से प्राप्त होता है। कामसूत्रानुसार प्रजापति ब्रह्मा द्वारा दिये गये उपदेश, कामशास्त्र के आदि ग्रन्थ में धर्म, अर्थ और काम त्रिवर्ग का विशद् विवेचन किया गया है। जिसमें धर्म और अर्थ के साथ काम का भी ब्रह्मा ने मानव जीवन के सभी पक्षों को ध्यान में रखकर विस्तृत उपदेशात्मक वर्णन किया है। इसके बाद आचार्य नन्दिकेश्वर (नन्दी) ने भी अपने कामशास्त्र में कामकेन्द्रित त्रिवर्ग का विस्तृत विश्लेषण किया है। तत्पश्चात् भारतीय ऋषियों, महर्षियों, मुनियों, शास्त्रज्ञों, कवियों और लेखकों ने इस कामशास्त्रीय चिन्तन परम्परा को और भी समृद्ध किया है।

वैदिक-कालीन मनीषियों ने काम को प्रकृति का मूल समझकर कामशास्त्र के दार्शनिक पक्षों को प्रस्तुत करते हुए, इसके आध्यात्मिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों पर भी पर्याप्त चिन्तन किया है। इसके साथ ही साथ मानव-जाति को अपने ज्ञान से निःश्रेयस की तरफ प्रवृत्त कराने का मार्ग प्रशस्त किया है। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए उत्तरवर्ती मुनियों, कवियों और शास्त्रज्ञों आदि ने कामशास्त्र पर मुख्यरूप से विचार-विमर्श करते हुए ग्रन्थ लेखन का कार्य किया। कामशास्त्र को भारतीयों ने अपने जीवन शैली में इस प्रकार से ग्रहण किया कि कामशास्त्र हमारी संस्कृति का एक अमूल्य भाग हो गया है। कामशास्त्र का यथोचितरूप में अध्ययन-अध्यापन करते हुए, इसके आध्यात्मिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्त्व को समझना परमावश्यक है।

भारतीय शास्त्रज्ञों ने धर्म के लिए धर्मशास्त्र, अर्थ के लिये अर्थशास्त्र, काम के लिए कामशास्त्र और मोक्ष के लिये मोक्षशास्त्र की रचना की। यहाँ पर एक बात ध्यान देना आवश्यक है कि ये सभी शास्त्र वाह्य रूप से अलग होते हुये भी, एक-दूसरे से आन्तरिक रूप से सम्बद्ध है क्योंकि किसी एक शास्त्र के बिना, दूसरे शास्त्र की कल्पना नहीं की जा सकती है। भारतीय चिन्तन परम्परा में जब कोई भी विद्वान किसी भी ग्रन्थ का, जब प्रणयन करता है या किसी भी विषय पर चिन्तन/उपदेश देता है, तब वह सभी शास्त्रों को ध्यान में रखते हुये सबको संयमित एवं सुनियोजित रूप से समाहित करता है। वह चाहे वैदिककालीन विद्वान हो या उत्तर वैदिककालीन। उदाहरण स्वरूप अनेक नाम सम्मुख उपस्थित होते हैं। जैसे – पुरूरवा, श्रीकृष्ण, याज्यवल्क्य, मैत्रेयी, गार्गी, अभिनवगुप्त, आदि शंकराचार्य, गौतमबुद्ध, भरतमुनि, वात्स्यायन, बाभ्रव्य, भारवि, भास, कालिदास, शूद्रक, कोक्कोक, दीक्षित सामराज आदि। मानव समाज इन्हीं चार पुरुषार्थ-परक शास्त्रों को आधार बनाकर अपना जीवन, आनंद-पूर्वक व्यतीत करता है और निःश्रेयस को प्राप्त करता है। परन्तु वर्तमान समय में व्याप्त अनेक प्रकार की समस्याओं से विश्व का मानव समाज अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों से ग्रसित है और पारिवारिक जीवन को दुःखमय बना रहा है। गृहस्थ जीवन को ही अध्यात्म की उच्चतम सीमा स्वीकार किया गया है क्योंकि गृहस्थ जीवन से ही परिवार का निर्माण होता है। तथा परिवार से समाज एवं समाज के व्यक्तियों में सभी प्रकार के मनोवैज्ञानिक आयामों का भी निर्माण होता है। अतः गृहस्थ-जीवन के केन्द्र में ही काम की सत्ता उपस्थित है।  

कामशास्त्र के ग्रन्थों का प्रभाव केवल कामकला विषयक विद्या पर ही नही पड़ा अपितु इसके इतर काव्य, साहित्य, नाटक, तन्त्र, विज्ञान, दर्शन, संस्कृति, सभ्यता, अध्यात्म, कला आदि पर भी प्रभाव पड़ा। कला के क्षेत्र में कामशास्त्र के अन्तर्गत कामसूत्र को भारतीय ज्ञान परम्परा का आदर्श ग्रन्थ माना जाता है। वात्स्यायन विरचित कामसूत्र कामशास्त्र का अद्वितीय ग्रन्थ हैं। इस ग्रन्थ कि महत्ता प्राचीन काल में जितनी थी, उससे कहीं ज्यादा आधुनिक काल में है। जिन ६४ कलाओं को कामशास्त्र के अन्तर्गत कामसूत्र के आचार्य वात्स्यायन ने स्वीकार किया था, बाद के आचार्यो ने उसी को प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया। स्थापत्यकार, मूर्तिकार, चित्रकार आदि ने अपनी-अपनी कलाओं में कामसूत्र के शास्त्रीय विधानों को समादृत किया। आज भी कामसूत्र के विधि-विधानों का अंकन, चित्रण, उत्कीर्णन सर्वत्र दृष्टिगत होता है।

भारतीय संस्कृति सदैव दो मतों का विरोध करती रही है- १. नितान्त भौतिकतावादी विचार, २. भौतिकवादी व्याख्या पद्धति से उत्पन्न विचार। कामशास्त्र भी इन दोनों मतों का विरोध करता है और एक सभ्य समाज को बौद्धिक एवं आर्थिक दृष्टि से उन्नत एवं विकसित कैसे किया जाये, इसकी व्याख्या करता है। क्योंकि कामशास्त्र के अन्तर्गत कामसूत्र ग्रन्थ प्रथम सूत्र में ही बताता है कि धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार है अर्थात् काम धर्म से सम्बन्धित होना चाहिये। कामशास्त्र मानव जीवन के सभी आयामों पर विचार विमर्श करता है। कामशास्त्र केवल भौतिकवादी शास्त्र नहीं है अपितु सम्पूर्ण संस्कृत वांग्मय से जुड़ा हुआ, एक सर्वांगीण स्वास्थ्य-वर्धक जीवन-पद्धति का शास्त्र  है। भारतीय बौद्धिक परम्परा में काम को जब षड्रिपु से दूर कर देते हैं, तो काम (कामशास्त्र) को धर्म, अध्यात्म एवं दर्शन का माध्यम मान लिया जाता है। यह समीचीन है कि भारतीय संस्कृति में लोक और लोकोत्तर विरोधी नहीं हैं अपितु ये दोनों अवधारणायें एक-दूसरे की सम्पूरक है।

दर्शन का एक अंग अध्यात्म भी है, यदि कामशास्त्र के आध्यात्मिक पक्ष पर दृष्टिपात किया जाए तो हम देखते है कि वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों आदि भारतीय ग्रंथो में काम को संसार का आधार कहा गया है। यह काम तत्त्व संसार के चराचार जगत में विद्यमान है। काम की उत्पत्ति परब्रह्म के ह्रदय से हुई है। काम जीवन का अनिवार्य अंग है और यह ही प्राणी के सद्गति और दुर्गति का कारण भी है। इसीलिए काम का पालन मर्यादित रूप से करना चाहिए। ‘काम’ पंचज्ञानेंद्रियों के द्वारा मन के माध्यम से तत्तत् विषयों में आत्मा को होने वाली अनुकूलनात्मक अनुभूति का परिणाम है। मनुष्य में मूल रूप से जन्मत: तीन प्रवृत्तियाँ पायी जाती है:  आहार परिग्रह ३- संतान। इन्हीं तीनों का अपर नाम है –  तृष्णा, लोभ और काम। यह तीनों वस्तुत: एक ही काम संकल्प से उत्पन्न हुये हैं। वेद और दर्शन में ‘अहं स्याम्’ (मैं होऊं), ‘अहं बहु स्याम्’ (मैं सदा बना रहूँ) और ‘अहं बहुधा स्याम्’ (मैं सर्वसम्पन होऊं)। ये तीनों रूप एक ही काम संकल्प के है। दर्शनों में इन तीनों को क्रमश: लोकैषणा (आहार इच्छा), वित्तैषणा (परिग्रह-इच्छा) और सुतैषणा (संतान इच्छा) कहा गया है। 

कामशास्त्र के अनुसार सामाजिक संरचना कैसी होनी चाहिये इस पर कामशास्त्र के ग्रन्थ कामसूत्र में उल्लेखित है कि सर्वप्रथम प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के बाद लोक में सुचारु रुप से व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से एक लाख श्लोक परिमाण ग्रन्थ का प्रवचन किया था। उसमें धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्ग का प्रतिपादन किया था। इसमें से धर्मविषयक श्लोको का अध्ययन करके स्वायम्भुव मनु ने मानव धर्मशास्त्र की पृथक रचना किया। उसी के अर्थ विषयक अंग को लेकर देवताओं के गुरु आचार्य बृहस्पति ने अर्थशास्त्र का निर्माण किया। अत: इसी प्रकार से नन्दी ने कामविषयक भाग को ग्रहण करके एक हजार अध्यायों में कामशास्त्र का निर्माण किया। कामशास्त्र की परम्परा को उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने पाँच सौ अध्यायों मे वर्णित किया। पुन: पांचाल देश के निवासी बाभ्रव्य ने १५० सौ अध्यायों मे संक्षिप्त किया तथा इसमें सात अधिकरण थे। सातों अधिकरणों पर, अलग-अलग आचार्यों ने अलग-अलग ग्रन्थों का प्रणयन किया। उन सातों के नाम निम्नलिखित हैं –

१. आचार्य चारायण ने साधारण अधिकरण पर।

२. आचार्य सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक अधिकरण पर।

३. आचार्य घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण पर।

४. आचार्य पतञ्जलि ने भार्याधिकारिक अधिकरण पर। 

५. आचार्य गोणिकापुत्र ने पारदारिक अधिकरण पर।

६. आचार्य दत्तक ने वैशिक अधिकरण पर। ७. आचार्य कुचुमार ने औपनिषदिक अधिकरण पर।

इस प्रकार से आचार्य बाभ्रव्य का ग्रन्थ बहुत विशाल एवं दुरध्येय था। इसलिये आचार्य वात्स्यायन ने सूत्र रुप में सम्पूर्ण पूर्ववर्ती कामशास्त्रीय ग्रन्थ परम्परा को कामसूत्र मे समाहित कर दिया। जिसमें उक्त सभी ग्रंथों का सार समन्वित था, जो संस्कृत के साहित्य जगत में सर्वमान्य हो गया। वात्स्यायन के कामसूत्र में धर्म, अर्थ और काम के विषय में चिन्तन हुआ है। कामसूत्र में कुल ७ अधिकरण, ३६ अध्याय, ६४ प्रकरण और १२५० सूत्र है। कामसूत्र को कामशास्त्र का उपजीव्य ग्रन्थ माना जाता है। कामशास्त्र के कुछ ग्रंथों के नाम निम्न हैं – कोक्कोक-कृत रतिरहस्य, ज्योतिरीश्वरकृत पंचसायक, कुल्लिनमल्लकृत अनंगरंग, पद्मश्रीकृत नागरसर्वस्वम् इत्यादि। ये सभी ग्रन्थ ९-१६ वीं शती के मध्य लिखें गये हैं। भारतीय विद्वान कामसूत्र को ईसा पूर्व २-३ शताब्दी में रचा हुआ ग्रन्थ मानते हैं। परन्तु विंटरनिट्ज ने भाषा प्रयोग के आधार पर वात्स्यायन का समय ईसा-पूर्व चतुर्थ शताब्दी स्वीकार किया है। कामसूत्र पर सर्वप्रथम जयमंगला टीका यशोधर पंडित के द्वारा राजा विसलदेव के राज्यकाल में (१२४३-१२६१ ई०) में लिखी गयी। 

इस संसार में जब कोई जीव (विशेषरूप से मनुष्य) उत्पन्न होता है, तब से लेकर शैशवावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था तक मनुष्य के मन-मस्तिक, विचारों में और उसके जीवन शैली  में मनोविनोद हेतु, क्या-क्या परिवर्तन आते हैं, यह सब भी एक शोध के विषय हैं। कामशास्त्र के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के अन्तर्गत मनुष्य के कामविषयक, कला विषयक और वासनात्मक मनःस्थित्ति के पक्षों को प्रस्तुत किया गया है।

भारतीय बौद्धिक परम्परा एवं संस्कृति को शाश्वत बनाये रखने हेतु ऋषि/मनीषियों ने पुरुषार्थ त्रिवर्ग/चतुर्वर्ग को व्यवस्थापित किया। इसके अन्तर्गत ही सामान्यतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ) एवं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र (वर्ण) तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ  और संन्यास को प्रतिपादित कियें। अतः संक्षेपतः भारतीय संस्कृति के विषय में यह कहा जा सकता है कि – “भारतीय संस्कृति, पुरुषार्थ त्रिवर्ग/चतुर्वर्ग, वर्ण चतुष्टय, आश्रम चतुष्टय और षोड़स (१६) संस्कारों का सामञ्जस्य एवं समन्वयपरक रूप है।” उपर्युक्त सभी की समन्वयता ही भारतीय संस्कृति का मूलरूप है। पुरुषार्थ के अन्तर्गत मोक्ष को कामशास्त्र नहीं स्वीकार करता है। 

मोक्ष को धर्म के अन्तर्गत रखने के कारण ही कामशास्त्र में पुरुषार्थ त्रिवर्ग को प्रतिपादित किया गया है। यदि धर्म, अर्थ और काम में समन्वय और साहचर्य स्थापित किया जाये तो मोक्ष की प्राप्ति तो हो ही जाती है और जब अद्वैत भाव जाग्रत होता है तब मोक्षानुभुति होती है। जो व्यक्ति या समाज कालानुसार धर्म, अर्थ और काम का सेवन करता है, वह व्यक्ति या समाज इस लोक और परलोक में भी सुखी रहता है।

कामशास्त्रीय आचार्यों ने इस शास्त्र का फल (उद्देश्य) त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) की प्रतिपत्ति (प्राप्ति) को ही माना है। त्रिवर्ग की प्रतिपत्ति के लिये उसके उपाय अत्यन्त आवश्यक है। 

कामशास्त्रानुसार काम को ही परम पुरुषार्थ मानते हुए, धर्म को भी विशेष स्थान दिया गया है। क्योंकि धर्म के सामजिक, राजनीति, रीति-नीति, शास्त्रज्ञान एवं नैतिकता के ज्ञान के बाद ही व्यक्ति एवं समाज अर्थ एवं अर्थाजन की ओर प्रवृत्त होता है। अतः धर्म, अर्थ का माध्यम है तथा धर्म एवं अर्थ की प्राप्ति हो जाने पर व्यक्ति/समाज की प्रवृत्ति काम के प्रति स्वतः होती है। अतः इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि “धर्म एवं अर्थ साधन है और काम साध्य है”। इसीलिये कामशास्त्र और कामशास्त्र मतावलम्बी काम को परम पुरुषार्थ मानते हैं।

कामशास्त्र का बहुप्रतिष्ठित एवं ख्यातिलब्ध ग्रन्थ कामसूत्र के प्रथम सूत्र में ही ग्रन्थ की सुचारु रूप से निर्विघ्न समाप्ति हेतु एवं देवताओं के अभिवादनार्थ मंगलाचरण किया गया है। भारतीय संस्कृति  में मंगलाचरण करने की प्राचीन परम्परा प्रचलित रही है। चूँकि धर्म, अर्थ एवं काम ही कामसूत्र के इष्ट-देवता है और त्रिवर्ग की प्राप्ति ही इसका मुख्य उद्देश्य है, अतः त्रिवर्ग को नमस्कार किया गया है। तत्पश्चात कामशास्त्रीय आचार्यो को नमस्कार किया है।

कामशास्त्र केवल काम के उपायों की ही विशद् विवेचना नही करता है अपितु सर्वांगीर्ण शास्त्र की विवेचना करता है। इसमें काम की प्रमुखता होते हुये भी, आनुषांगिक रूप से धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, मोक्षशास्त्र और अन्य शास्त्र का भी उल्लेख है। इस जगत में मानव को सामाजिक जीवन यापन करने हेतु मानव को अनेकानेक मानसिक व्यापार करना होता है।

जब मानव-मन को अपनी इच्छाओं के पूर्ण होने से सन्तुष्टि की प्राप्ति होगी, तब वह व्यक्ति/समाज पूर्ण मनोयोग से अर्थार्जन एवं सामाजिक रीति-नीति में ध्यान केन्द्रित कर सकेगा। साथ ही धर्मादि का अधिकार होने से इनके अधिष्ठाता देवता भी अधिकृत होते हैं। 

कामशास्त्र भारतीय जीवन दर्शन का मूलाधार है। कामशास्त्र को लेकर वर्तमान समय में, वाह्य संस्कृतियों के दुष्प्रभाव के कारण भारतीय समाज में एक संकुचित दृष्टिकोण हो गया है, जबकि विश्व की दृष्टि में कामशास्त्रीय ग्रन्थों का बहुत ही व्यापक रूप से अध्ययन-अध्यापन व शोध के क्षेत्र में प्रख्याति हुई है। यदि लोग कामशास्त्र को भारतीय परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करें और समझने का प्रयास करें तो समाज में जो विभिन्न प्रकार की कुरीतियाँ, समस्यायें, संक्रामक बीमारियाँ आदि व्याप्त हैं, उन सबका सरलता से निदान संभव हो जायेगा। कामशास्त्र का अध्ययन-अध्यापन प्राचीन काल में कैसे कराया जाता था और वर्तमान समय में कैसी शिक्षा व्यवस्था हो, इस शोध प्रश्न पर भी दृष्टिपात करना है। कामशास्त्र का गृहस्थ जीवन शैली और अध्यात्म पर कैसे प्रभाव पड़ता है और इसकी क्या महत्ता है, इस पर भी विचार करना समीचीन है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्परा में कामशास्त्र किस प्रकार से केन्द्रित है और इसकी मनोवैज्ञानिकता क्या है, यह भी शोधपरक प्रश्न है। 

अतः यह कहा जा सकता है कि- भारतीय शास्त्र परम्परा में कामशास्त्र का अभिन्न योगदान है, जिसके माध्यम से भारतीय इतिहास, कला, संस्कृति, सभ्यता, परम्परा, धर्म, दर्शन, अध्यात्म, पुरुषार्थ, मनःस्थिति, शिक्षा-पद्धति, समाज इत्यादि विविध आयामों को पारिभाषित किया गया है। कामशास्त्र की अवधारणा ब्रह्मा की मानवी-सृष्टि के पूर्व से ही विद्यमान थी, मानवीय उत्पत्ति के बाद मनुष्य की उन्नति एवं उनकी परम्परा की रक्षा के लिए ब्रह्मा ने त्रिवर्ग केन्द्रित इस शास्त्र का भी उपदेश दिया। तथा इसी मत को ब्रह्मा, नन्दी, श्वेतकेतु, बाभ्रव्य, वात्स्यायन इत्यादि आचार्यगणों ने अपने-अपने उपदेश व ग्रन्थों में व्याख्यायित किया है।

कामशास्त्र में प्रमुख रूप से धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) को विवेचित किया गया है क्योंकि त्रिवर्ग के सुनियोजित व संयमित कर्तव्य-प्रणाली से ही परमार्थ की सिद्धि होती है। इसीलिये सभी मानव समाज और गृहस्थ आश्रम के लिए कामशास्त्र के अध्ययन की आवश्यकता परम्परा में बताई गयी है। वास्तव में जो लोग धर्म के व्यापक रूप को नहीं समझते हैं, वे लोग ही कामशास्त्र परम्परा का विरोध करते हैं, क्योंकि ऐसे संकुचित दृष्टिकोण वाले लोगों को यह ज्ञात ही नहीं है कि वे अपनी ऋषि/आचार्य, शास्त्र परम्परा की और प्रकृति की अवमानना व अपमान कर रहें हैं। ऐसे संकुचित लोग ही अपनी संस्कृति, इतिहास और शास्त्र परम्परा के विरोधी होते हैं, जिनसे राष्ट्रीय-ज्ञाननिधि को संकट भी होता है, क्योंकि इस प्रकार के लोग केवल एकांगी होते हैं, जिससे उन्हें अपनी शास्त्र परम्परा की सम्यक् समझ ही नहीं होती है। भारतीय ऋषि परम्परा ने कामशास्त्रीय ग्रन्थों की रचना करते हुए एकस्वर में कहा है कि – “गृहस्थ आश्रम के लिए कामशास्त्र के अध्ययन की परम आवश्यकता है और युवावस्था से ही इस शास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ करा देना चाहिए।” अतः देखा जाये तो एकांगी और संकुचित दृष्टिकोण वाले लोग ही अपनी शास्त्र-परम्परा, ऋषि-परम्परा और अपने पूर्वजों के परमविरोधी हुये, तथा जो ऋषि व शास्त्र विरोधी होता है वही राष्ट्रविरोधी होता है। अतः हमें भारतीय शास्त्र परम्परा को एकांगी न सोचकर, सर्वांगीण, सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सामंजस्यपरक और सर्वशास्त्र-सम्मत गर्व से स्वीकार करते हुए अध्ययन व विश्लेषण करना चाहिए। मानव जीवन को आनन्ददायक व सिद्धिपरक बनाने के लिए कामशास्त्र में चौंसठ विद्यात्मक कलाओं को बताया गया है। तथा गार्हस्थ्य जीवन में संभोग सुख को आनन्ददायक बनाने के लिए चौंसठ आसनात्मक काम-कलाओं को व्याख्यायित किया गया है, क्योंकि संभोग भी प्रकृतिगत जीवन के लिए, संसार को बनाये रखने के लिए परमावश्यक है। इस प्रकार की विभिन्न आनन्द-दायक विद्या एवं कलाओं का ज्ञान धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र अथवा अन्य किसी भी शास्त्र परम्परा से प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसीलिए ऋषियों ने कामशास्त्र परम्परा का विस्तृत चिन्तन करते हुए, अनेक ग्रन्थों की रचना की। अतः गृहस्थ जीवन को आनन्दमय, सुनियोजित, संयमित, सुखी, सम्पन्न और समृद्धिपरक बनाने के लिए कामशास्त्र का अध्ययन-अध्यापन नितान्त आवश्यक है।

कामशास्त्रीय ग्रन्थ परम्परा से ही यह ज्ञात होता है कि सम्भोग का सर्वोत्तम व आध्यात्मिक उद्देश्य है कि दाम्पत्य-जीवन में आध्यात्मिकता हो, संसार में मानवीय–प्रेम, परोपकार और सम्यक् रूप से उदात्त भावनाओं का विकास हो। इस प्रकार का ज्ञान अन्य जीव-जन्तुओं को नहीं होता है क्योंकि वे केवल स्वेच्छा के लिए यौनक्रिया करते है, सम्भोग क्रिया नहीं। यौनक्रिया स्वेच्छाचारी होती है और सम्भोग क्रिया परहित व समाज-हितकारी होती है। अतः कामशास्त्र व सम्भोग के उद्देश्यों का ज्ञान न रखने वाला मनुष्य रमणक्रिया में पशुवत् आचरण करता है। दाम्पत्य-जीवन में पति और पत्नी को परस्पर पूर्णता की अनुभूति होना ही उनकी आध्यात्मिक व मानसिक स्वीकृति है।

गृहस्थ जीवन में आत्मीय प्रेम का होना परमावश्यक है और यदि दम्पति में आत्मीयता नहीं है तो परस्पर कलह, सम्बन्ध-विच्छेद, गुप्त-व्यभिचार, वेश्यावृत्ति, नारी अपहरण, अप्राकृतिक व्यभिचार इत्यादि विविध दुष्परिणाम, दुर्घटना, उदासीनता और सामाजिक समस्यायें उत्पन्न होती हैं, जो कि समृद्ध, उन्नत व संस्कारी समाज के लिए घातक सिद्ध होता है, अतः इस प्रकार की सभी समस्याओं का निदान गार्हस्थ्य जीवन में उत्पन्न आत्मीय भावों से ही सम्भव है। कामशास्त्रीय ग्रन्थों में इन सभी समस्याओं के निदान के उपाय भी बताये गये हैं। अतः कामशास्त्र स्वस्थ्य मानव समाज के लिए औषधि तुल्य है। कामशास्त्रीय ग्रन्थ परम्परा से ही गृहस्थ के विभिन्न प्रकार के भावों का ज्ञान होता है, जैसे – सम्भोग, सन्तानोत्पत्ति और कामसम्बन्धी समस्याओं के प्रति आदर्शमय भाव, इस संसार में मनुष्य जाति का परस्पर उत्तरदायित्व रूपी भाव और अपने नायक या नायिका के प्रति उत्तमभाव, रतिभाव, स्नेहभाव, श्रद्धाभाव रखना आदि। अतः कामशास्त्र गृहस्थ जीवन के लिए शिक्षक व गुरुकुल स्वरूप है, क्योंकि इस शास्त्र के माध्यम से गृहस्थ को अपने धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक इत्यादि बहुविध आयामों का ज्ञान प्राप्त होता है।

नर (पति) और नारी (पत्नी) के सम्बन्धों को लेकर शास्त्र का मानना है कि – ये दोनों विद्युत की दो धाराओं के समान परस्पर लौकिक जीवन में व्यवहार करते हैं अर्थात् नर अपकर्षण का और नारी आकर्षण का व्यवहार करती है। इन दोनों का परस्पर आकर्षण और अपकर्षण ही सृष्टि-संरचना की निरन्तर गतिशीलता का आधार स्तम्भ है। इसका मनोवैज्ञानिक मत यह है कि भिन्न लिंग होने के कारण नर व नारी में परस्पर आकर्षण होता है। तथा इसका आध्यात्मिक मत यह है कि – स्त्री और पुरुष की परस्पर पूर्णता ही उनके दाम्पत्य जीवन की आध्यात्मिकता है। कामशास्त्र का मानना है कि कामेच्छा मनुष्य के शरीर में जन्मकाल से ही वास करती है। तथा यह कामेच्छा या कामशक्ति शरीर के विभिन्न ग्रन्थियों में द्रव के रूप में विद्यमान रहती है और स्वभाव सिद्ध होकर मानव जीवन को शक्ति के रूप में पूर्ण संवेग के साथ संचरणशील बनाये रखती हैं। कामशास्त्रीय ग्रन्थों में कहा गया है कि स्त्री एवं पुरुष को धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और अन्य सभी शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए परन्तु इसके साथ ही कामशास्त्र का अध्ययन एवं इसकी अंगभूत विद्याओं (साहित्य, संगीत, कला इत्यादि) का भी अध्ययन करना चाहिए। इस शास्त्र परम्परा में स्त्रियों के अध्ययन के लिए विशेष व्यवस्था बतायी गई है। विवाह से पूर्व स्त्री को अपने पिता के घर में धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा कामशास्त्र का अध्ययन करना चाहिए। तथा विवाह हो जाने के पश्चात् पति की अनुमति लेकर स्त्री को अन्य शास्त्रों के साथ कामशास्त्र का भी अध्ययन करना चाहिए। अतः कामशास्त्रीय ग्रन्थ परम्परा में स्त्री और पुरुष को समान शिक्षा प्रणाली में रखते हुए समान कर्तव्य व अधिकार प्रदान किया गया है, परन्तु देश, काल, परिस्थिति, गुण और धर्म को ध्यान में रखकर। जिससे दोनों की शारीरिक, मानसिक, लौकिक और पारलौकिक उन्नति में समन्वय एवं पूर्णता की सिद्धि हो।

प्रथम अध्याय – कामशास्त्र की पृष्ठभूमि

  • कामशास्त्र का उद्भव एवं विकास
  • कामशास्त्र की प्राचीनता और प्रामाणिकता
  • कामशास्त्र की शिक्षा-पद्धति
  • पुरुष एवं स्त्रियों को कामशास्त्र की शिक्षा
  • अनुबन्ध चतुष्टय और कामशास्त्र का प्रयोजन
  • भारतीय ग्रन्थ परम्परा में कामशास्त्र का स्थान
  • भारतीय मन्दिरों में कामशास्त्रीय उपासनात्मक चित्रों का उत्कीर्णन
  • कामशास्त्र का अन्य शास्त्रों से सम्बन्ध
  • कामशास्त्र और वैदिक एवं पौराणिक परम्परा
    • कामशास्त्र और तान्त्रिक परम्परा
    • कामशास्त्र और आयुर्वेदशास्त्र
    • कामशास्त्र और ज्योतिशास्त्र
    • कामशास्त्र और धर्मशास्त्र
    • कामशास्त्र और अर्थशास्त्र
    • कामशास्त्र और काव्यशास्त्र
    • कामशास्त्र और सौन्दर्य/कलाशास्त्र
    • कामशास्त्र और दर्शनशास्त्र
    • कामशास्त्र और मनोविज्ञान
    • कामशास्त्र और वानस्पतिकशास्त्र
    • कामशास्त्र और नीतिशास्त्र

द्वितीय अध्याय – कामशास्त्रीय आचार्य/ग्रन्थ परम्परा : ऐतिहासिक दृष्टिकोण

  • कामसूत्र के पूर्ववर्ती आचार्य/ग्रन्थ परम्परा
  • कामसूत्र के परवर्ती आचार्य/ग्रन्थ परम्परा

तृतीय अध्याय – कामशास्त्र का आध्यात्मिक अध्ययन

  • गार्हस्थ्य का आध्यात्मिक स्वरूप
  • भारतीय आध्यात्मिक ग्रन्थ परम्परा में कामतत्त्व
    • काम और सृष्ट्योत्पत्ति
    • कामतत्त्व
  • गार्हस्थ्य का हेतु
  • आध्यात्मिक कामतत्त्वज्ञ

चतुर्थ अध्याय – कामशास्त्र का सामाजिक अध्ययन

  • वर्ण व्यवस्था
    • ब्राह्मण
    • क्षत्रिय
    • वैश्य
    • शूद्र
  • जाति व्यवस्था
    • सोलह प्रकार की कर्मगत जातियाँ
  • आश्रम व्यवस्था
    • ब्रह्मचर्य
    • गृहस्थ
    • वानप्रस्थ एवं सन्यास
  • पुरुषार्थत्रयी का सामाजिक अध्ययन
    • धर्म का सामाजिक स्वरूप
    • अर्थ का सामाजिक स्वरूप
    • काम का सामाजिक स्वरूप
  • नागरक के सामाजिक-जीवन का अध्ययन
    • नागरक का वासस्थान
    • नागरक की गृहसज्जा
    • नागरक की दिनचर्या
    • नित्यकर्म
    • नैमित्तिककर्म
    • उत्सव और समाज – मदनोत्सव
  • कामशास्त्रानुसार नायिका का सामाजिक अध्ययन
    • कन्या
    • पुनर्भू
    • वैश्या
    • तृतीया-प्रकृति
  • कामशास्त्रीय औरस पुत्र की सामाजिक स्वीकृति
  • कामशास्त्रीय विवाह संस्कार का सामाजिक अध्ययन
    • विवाह का उद्देश्य
    • विवाह का निर्धारण
    • वर एवं कन्या की योग्यता
    • वैवाहिक विधि
    • विवाह के प्रकार
    • वैवाहिक स्थिति

पञ्चम अध्याय – कामशास्त्र का मनोवैज्ञानिक अध्ययन

  • मनस् तत्त्व का स्वरूप
  • काम की दश मनःस्थिति का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
  • कामशास्त्रीय कलाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
  • भारतीय कला का उद्भव एवं विकास
  • कामशास्त्रीय चतुःषष्टि कलाओं का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अर्थनिर्धारण
    • पाञ्चालिकी चतुषष्टि कला की मनोवैज्ञानिकता
    • वासनात्मक मानवीय प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
    • वासनात्मक काम की मनःस्थिति
  • भौगोलिक आधार पर कामशास्त्रीय नायिकाओं की मनोप्रवृत्ति
  • मोक्ष का मनोवैज्ञानिक अध्ययन

 

*Please note that if the number of registrations is less than 15, this Indica Course will be offered in the self-paced mode. The change of format shall be notified through email. Learners will also be notified when pre-recorded lectures are available for their perusal on the learning portal. There will no change in the course fee. Learners not interested in pursuing the self-paced format can either request for a transfer into any existing or upcoming course or a credit voucher redeemable in future for another course.

Teacher
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Dr. Raghavendra Mishra

Assistant Professor, Miranda House, Delhi University

Dr. Raghavendra Mishra is a scholar of Sanskrit Language, Literature, Cultural and Indic Studies. He was awarded Ph.D. from the School of Sanskrit & Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi. He has completed his M.A and M. Phil degrees from the School of Sanskrit & Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.His M. Phil. research was on "Cultural and Philosophical Dimensions of Kama – Purushartha” and his Ph.D. thesis was on "Spiritual, Social and Psychological Study of Kamashastra". Dr. Mishra has taught the SK-210 Course “Pratyabhijna Darshan - Self Realization” in Jawaharlal Nehru University. He has delivered talks on Indian Vedic Traditions in the Bhishma Indic Centre at Pune, Maharashtra. He has qualified the UGC-NET/JRF twice - in Sanskrit and Women Studies. He was much appreciated for his subject presentation on "Tripartite Theory of Kama" in the Indian Knowledge System at the International Conference at Texas, USA. His research and ideas are focused to solve problems related to family and social life. He holds ideas on life-work balance for meaningful life; how to handle social problems like depression, suicide, problems related to unitary family in urban setting, health and wellbeing of youth, including mental health issues, overcoming inferiority complex and sexual problems, issues related to marriage and kinship, annulment and split families, inter-personal relationship etc. Dr. Mishra has been awarded the Sanskrit Pratibha Puraskar twice by the Delhi Sanskrit Academy. He has also won the Delhi Para Athlete Award by the Government of NCT Delhi, New Delhi twice. To his credit, he has composed Chalisa (poetic verse), for our great freedom fighters in Indic verse and contemporary Doha and Chaupai style. He has published three chapters in books and many researched papers in refereed national and International journals, and presented papers and participated in many national and international conferences, seminars, workshops etc.

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